Maharana Pratap : महाराणा प्रताप का इतिहास Deadly योद्धा 208

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Maharana Pratap :आज से 500 साल पहले दिल्ली की सल्तनत पर मुगल सल्तनत की चमक बुलंद हो चुका था और इसके बाद शहर के सिंहासन पर अकबर की हुकूमत थीविस्तारवादी नीति का पादशाह था शुरुआत से ही अकबर ने आज पड़ोस के राज्यों को मुगल सल्तनत के झंडे के नीचे लाने पूर्व को जीतने के बाद अकबर ने अपने पश्चिम अभियान में राजपूताने की रियासतों पर मुगल ध्वज फहराने के शपथ लीतहत राजपूताने में सबसे पहले आमिर रियासत ने अपनी पगड़ी उतार कर अकबर की बादशाह हाथ वाली मुगल सत्ता को स्वीकार कर लिया शुरू में तो राजपूताने की दूसरी रियासतों ने आमिर रियासत को एक दुख की अधीनता स्वीकारने पर धिक्कारना शुरू कर दिया.

पर बाद में धीरे-धीरे इन रियासतों ने भी अकबर की सत्ता को स्वीकार कर लियाजब राजस्थान की बड़ी-बड़ी रियासतें अपने मध्यमस्त शान को गुलामी की वीडियो में बांधने में लगी हुई थी उसे वक्त मात्रा मेवाड़ अपने स्वाभिमान की चमक भी खेलते हुए पूरी दुनिया के साथ खड़ा था इस समय मेवाड़ पर राणा उदय सिंह का शासन हुआ करता था जिन्होंने अपने पूर्वजों की भांति किसी की अधीनता कुछ स्वीकार नहीं किया.

राज तिलक28 फरवरी 1572
पूर्ववर्तीउदय सिंह द्वितीय
उत्तराधिकारीअमर सिंह प्रथम
मंत्रियोंभामाशाह
जन्म9 मई 1540, कुंभलगढ़, मेवाड़ हिन्दू
मृत19 जनवरी 1597 (उम्र 56), चावंड, मेवाड़
वर्तमान भारत में चावंड, उदयपुर जिला, राजस्थान, भारत)
जीवनसाथीमहारानी अजबदे ​​पुनवार 

उन्होंने अकबर को पत्र भिजवाया कि हमारे राजा सिर्फ भगवान एकलिंग जी हैं हम तो मात्र उनके दीन है और फिर भी अकबर ने राणा उदय सिंह पर भारी दबाव बनाना शुरू कर दिया आज पड़ोस के राजाओं को उदय सिंह के पास भेजा जाने लगा इन्हें परिस्थितियों में दिन गुजरते रहे और एक दिन अचानक मौसम बदलने लगा बादलों की घमासान गर्जना के बीच राणाउदास बड़ी रानी माता जयवंता बाई ने एक जन्म दिया मजबूत बदन बड़ी आंखें मुस्कान भी खेलता चेहरा बड़ा मनमोहक लग रहा था राणा उदय सिंह ने महल की औरतों से अपनी रानी के हाल-चाल पूछे तभी पाली की दशन ने जवाब दिया शेरनी ने शेर को जाना है 

बड़े खुश होने लगे वे कभी राणा कुंभा के बने विजय स्तंभ को देखने दौड़ते तो कभी बप्पा रावल की तलवार को प्रणाम करने सरदारों ने पूछा जी का नाम क्या होगा राणा शांत होकर बोले जिस तरह सूरज अपनी चमक से धरती को रोशन करता है इस तरह मेरा पुत्र अपने शौर्य के प्रताप से मेवाड़ को रोशन करेगा अतः इसका नाम प्रताप होगा कुंवर प्रताप सिंह सिसोदियामाता जय माता बाई कृष्ण भक्त थी उन्होंने शुरू से ही कुंवर प्रताप को भगवान कृष्ण और महाभारत की युद्ध कलाओं का ज्ञान दिया

Maharana Pratap history :

रानी जीवंत बाइक कुंवर प्रताप को बता दी कि किस तरह उनके दादा राणा सांगा ने अपनी तलवार की धार से दिल्ली की बादशाहत को रक्त से नहलाया किस तरह उनके परदादा बप्पा रावल का शौर्य के रक्त में नहाया हुआ कलेजा जब अरब की धरती पर घर जा तो आने वाले 400 सालों तक कोई भी विदेशी भारत की तरफ आंख उठाने की हिम्मत नहीं कर पाया

सिसोदिया वंश के इस अतीत को सुनते हुए प्रताप बड़े होने लगे समय आने पर उनको गुरुकुल भेज दिया गया जहां प्रताप सुबह का समय गुरुकुल में बिता दे दोपहर के समय में भीलों की बस्तियों में चले जाते शाम होते-होते प्रताप लोहार के कामों में निकल जाते उनको हथियार बनाने की कला सीखने में बड़ा आनंद आता था जनता के बीच इस कदर घुल मिल जाने पर प्रताप सबके चहेते बन गए बैलों ने उनको की का कहकर बुलायातो वही लोहार ने उनको अपना राजा मनाना शुरू कर दिया कुंवर प्रताप बचपन से ही वीर स्वाभिमानी और हाथी स्वभाव के थे

उनका शरीर सामान्य बच्चों से कई गुना मजबूत था उन्होंने एक छोटी सी उम्र में ही अफ़गानियों की बस्ती पर धावे बोलने शुरू कर दिए मेवाड़ से होकर गुजरने वाली मुगल सी पर भी गुलेल से हमला कर देते कुंवर के इन कारनामों को देखते हुए सबको लगने लगा था कि बड़े होने पर भी महाप्रक में योद्धा बनेंगे और प्रताप ही भविष्य में मेवाड़ के राणा बनेंगे उदय सिंह जी की कई रानियां भी थी 

जिनसे उनका कुल 33 संताने थी पर उदय सिंह जी की सबसे प्रिया रानी धीरूभाई थी सा उनकी बात को राणा उदय सिंह अधिक महत्व देते थे इन्हीं के कहने पर राणा उदय सिंह जी ने उनके पुत्र जगमाल को मेवाड़ का भाभी राणा घोषित कर दिया शास्त्रों के अनुसार सदैव बड़ा पुत्र ही राजा बनता है

पर सागर जैसे विशाल हृदय वाले कुंवर प्रताप ने पिता के इस आदेश को मानते हुए छोटे भाई जगमाल को राज सट्टा देना स्वीकार कर लिया किंतु सभी सामंत सरदार और राज्य की जनता ने उदय सिंह के फैसले पर विरोध किया वह कुंवर प्रताप को ही अपना राणा मानते थे समय के साथ राणा उदय सिंह का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और आसान 1572 आते-आते उनका स्वर्गवास हो गया उनके अंतिम संस्कार में कुंवर प्रताप सहित मेवाड़ का प्रत्येक व्यक्ति आय पर कुंवर जगमाल इस समय महल में अपना राज्याभिषेक करवा रहा था

ऐसी संकट की घड़ी में जगमाल के अपने पिता के अंतिम संस्कार में उपस्थित न होने के कारण सभी सरदारों ने यही गोगुंदा की पहाड़ियों पर है रक्त से मेवाड़ के असली हम श्री कुंवर प्रताप का राज्याभिषेक कर दिया सरकार रावत कृष्ण दास जु़डावतमें राणा प्रताप की कमर में तलवार पढ़ते हुए ललकार लगे मेवाड़ मुकुट केसरी कुंवर प्रताप सिंह आज से मेवाड़ के राणा है यहीं से राणा प्रताप ने अपने सरदारों के साथ कुंभलगढ़ की तरफ पूछ किया राणा के आने की खबर सुनकर छोटा भाई जगमाल राजगढ़ी छोड़कर अकबर की शरण में भाग गया

जिसके बाद साल 1573 को कुंभलगढ़ की राजगद्दी पर वीर शिरोमणि Maharana Pratap का विधिवत रूप से राजतिलक कर दिया गया कौन है यह महावीर है जिसे दुनिया ने मेवाड़ मुकुट हिंदू और सूरज के नाम से नवादामेवाड़ की राजनीति पर बैठने वाले Maharana Pratap एक ही बार में घोड़े सहित दुश्मन को काट डालते थे वह परम स्वामी भक्त थे जिनके नाम से ही दिल्ली की बादशाहत कहां पहुंचा करती थी उन्होंने जंगलों में रहना स्वीकार कर लिया पर कभी अकबर की गुलामी स्वीकार नहीं की

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72 किलो का भला 81 किलो के छाती कवच और 208 किलो के भारी वजन के साथ महाराणा युद्ध भूमि में निकलतेजिनके रौद्र रूप को देख सामने वाला दुश्मन अपना रास्ता पलट देता हल्दीघाटी के युद्ध में विशाल मुगल सी को जबरदस्त रख कर दी डाइवर्ट के युद्ध में मुगल सत्ता को घुटनों पर ले आए अपनी छापामार युद्ध नीति के दम पर मेवाड़ को फिर से आजाद करवरकर केसरिया ध्वज लहरा दिया

मुगलों के 36 किलो को जीतकर 40000 मुगलों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया जिनके भले की नोक से शत्रु का रक्त कभी सुख नहीं डिमांडजिनकी तलवार ने कभी पराजय का मुंह देखा नहीं यह कहा है उसे महाराणा की जिसके सामने हर भारतीय परंपरागत मस्तक होता है यह गाथा है भारी Mahara Pratap की 

फरवरी 1572 को महाराणा हुकुम ने मेवाड़ की राजगद्दी संभाली इस समय मेवाड़ की स्थिति काफी खराब थी पिता उधर सिंह जी के समय मुगलों के साथ हुए युद्ध में मेवाड़ की पूरी व्यवस्था बहाल हो चुकी थी खजाना खाली था और चित्तौड़ सहित मेवाड़ के बड़े भाग पर मुगलों का अधिकार हो चुका था और अकबर मेवाड़ के बचे हुए इलाके पर भी अपना अधिकार करना चाहता था Maharana Pratapने राजा बनते ही अपने समस्त सरकारों को बुलाया और उनसे कहा कि रघुकुल मां सदैव ऊंचा रहेगा मैं वार की छाती पर लहराता मुगल था जब मेरा कलेजा चीर देता है

बहुत जल्द हवाओं का रुख बदलेगा व्यापार पर केसरिया ध्वज पूरी शान से लहराएगामेवाड़ का भविष्य जरूर चमकेगी मैं शपथ लेता हूं जब तक मेवाड़ को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं करवा लेता तब तक मैं शांत नहीं बैठूंगा राजमहलों में नहीं रहूंगा पलंग पर नहीं सोऊंगा सोने चांदी के बर्तनों में भोजन नहीं करूंगा मेरे वीर हो स्वाभिमान की दहाड़ से हमारा टकरा अब विशाल फौजियों से होगा तैयार हो जाइए सभी सरदारों ने प्रतिघात के स्वर में अपने तलवार लहराई पूरा दरबार Mahara Pratap की जय कारों से गूंज उठा

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इसी के साथ Mahara Pratap ने अपनी सेवा को संगठित करना शुरू किया उन्होंने व्यवहार की मेलों के गांव का दौरा किया को अपने साथ जोड़ना शुरु किया लोहार को हथियारों के जखीरा बनाने का काम सोपा गया सरदारों को प्राचीन युद्ध कलाओं का अभ्यास करवाया जाने लगा Maharana Pratap द्वारा सी निर्माण के समाचार दिल्ली के बादशाह अकबर तक पहुंचने लगे

अकबर ने भी राणा प्रताप को रोकने की पूरी तैयारी शुरू की उन्होंने Maharana Pratap से अपनी अधीनता स्वीकार करवाने के लिए अपने दूध भेजना शुरू किया इसी के साथ अकबर ने अपने दरबार के सबसे चतुर दलाल खान को रुचि को Maharana Pratapके पास मेवाड़ भेजो पर Maharana Pratap ने अधीनता की बात सुनकर दलाल को तुरंत रवाना कर दिया

Maharana Pratap : महाराणा प्रताप का इतिहास Deadly योद्धा 208

इसके 1 साल बाद अकबर ने आमेर के राजा मानसिंह को Maharana Pratap के पास भेजा इस समय Maharana Pratap उदयपुर में थे मानिक सीधा उदयपुर आ गया महाराणा हुकुम ने मानसिंह का एक अतिथि की तरह सरकार किया Maharana Pratap उदय सागर झील तक मानव सिंह का स्वागत करने के लिए आए इस झील के सामने वाले तिल पर आमिर के राजा के लिए दावत की व्यवस्था की गई थी भोजन तैयार हो जाने पर मानसिंह को बुलावा भेजा गया Maharana Pratap ने अपने पुत्र अमर सिंह को अतिथि की सेवा के लिए लगा दिया पर Maharana Pratap भजन के लिए नहीं आए

मान सिंह द्वारा हुकुम के बारे में पहुंचने पर अमर सिंह ने बताया कि पिताजी को सर दर्द है वह नहीं आ पाएंगे आप भोजन करके विश्राम करें मानसिंह ने पूरे डांटे हुए कहा कि राणा जी से कहो कि उनके सर दर्द का कारण मैं समझ गया हूं मानसिंह राणा प्रताप के बिना भोजन स्वीकारने से मना कर दिया तब राणा प्रताप ने उन्हें संदेश भेजो कि जी राजपूत के संबंध एक तुर्क  से हो उनके साथ भला कौन राजपूत भोजन करेगा अब मान सिंह जवाब देने की स्थिति में नहीं था

क्योंकि राणा प्रताप ने तो उन्हें बुलावा भेजा ही नहीं था मानसिंह ने भोजन को छुआ तक नहीं केवल चावल के कुछ कानों को जो अन्य देवता को अर्पण किए थे उन्हें अपने पगड़ी में राणा प्रताप से कहा कि दिल्ली की बादशाहत को अस्वीकार करना एक संघर्ष को चुनौती है यदि आपकी इच्छा दुखों में रहने की है तो एक दिन आपकी इच्छा जरुर पूरी होगीमानसिंह ने आंखें टैंकर आगे कहा मैं तुम्हारा अभियान चरण कर दूंगा अगली मुलाकात युद्ध भूमि में होगी राणा प्रताप ने उत्तर दिया मैं प्रतीक्षा करूंगा

akbar vs maharana pratap

ऐसे ही अकबर ने Maharana Pratap के पास अपने चार दूध भेजें पर Maharana Pratap ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की Maharana Pratap द्वारा अधीनता स्वीकार न करने पर सन 1576 में अकबर अपने सभी सेनापतियों के साथ अजमेर आदम का यहां अकबर ने मानसिंह को एक लाख की विशाल मुगल सेवा का सेनापति घोषित किया 3 अप्रैल 1576 को मानसिक विशाल मुगल फौज लेकर मेवाड़ विजय के लिए निकल पड़ा

2 महीने चलने के बाद मानसिक खमन और नामक गांव में पहुंच Maharana Pratap के भीड़ सिपाहियों ने अपने राणा को संदेश भिजवाया की हुकुम मानसिंह असम के मुगल सी को लेकर मेवाड़ की तरफ बढ़ रहा है पर Maharana Pratap तो कब से अपनी तलवार की धार मजबूत कर ही रहे थे वह वाली भांति जानते थे कि युद्ध अवश्य होगा इधर मानसिंह बनास की नदी के मैदाने में आ पहुंचा मान सिंह ने या मौलाना काम में अपना डेरा लगाए

दूसरी तरफ महाराणा हुकुम ने अपनी 20000 की सेवा के साथ उसे 6 मिल सामने लॉजिंग गांव में अपना परिणाम डाला विशाल मुगल सेवा में राजपूत और मुगल थे जबकि महाराणा प्रताप की सेवा में राजपूत पठान और लोहार के गांव के लोग थे18 जून 1576 को संसार के अनोखे के युद्ध का अग्रस हुआ आकाश में घनघोर बदलत और धीमी धीमी हवाएं चल रही थी कभी-कभी बिजली की तेज गड़गड़ाहट हो रही थी

इसी बीच मुगल सी आगे बढ़ने लगी तभी महाराणा प्रताप ने अपने हरावल दस्ते को शत्रु पर प्रहार करने के लिए आगे भेज भूकंप की हवाल सी ने आगे बढ़ रही मुगल सेवा के तीन हरावल दोस्तों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया इस गणगौर हमले से घबराकर मुगल सेवा का हवाल खेमा लूणकरण के नेतृत्व में पेड़ों के झुंड की तरह भाग निकला

युद्ध भूमि में प्रवेश

अब मेवाड़ और मुगल सी आमने-सामने आ चुकी थी तभी वीर विराट मेवाड़ मुकुट हिंदू और सूरज Maharana Pratap ने युद्ध भूमि में प्रवेश किया राणा श्री के युद्ध में आते ही मुग़ल खेमे में दहशत का माहौल फैल गयामहाराणा जी और बढ़ जाते वहां शत्रुओं के लाशों के देर लग जाते मुगलों ने पहली बार महाराणा प्रताप को देखा था इससे पहले सिर्फ उनका नाम ही सुना था उन्हीं ने अपनी किताब में महाराणा प्रताप के संबंध में लिखा कि वह बहुत लंबे मजबूत और ताकतवर थे

प्रताप हाथ में तलवार लेकर जब चलते थे तो ऐसा लगता था कि मानव आदि सेवा को अकेले ही लेकर डूबेंगे उनके चेहरे पर सदैव गुस्से की लकीरें चमकती रहती थी युद्ध भूमि में शुरुआत से ही किसी मुगल सैनिक ने उनको छेड़ने की हिम्मत नहीं की महाराणा प्रताप की सेना ने तीन घंटा में ही लाशों के ढेर लगा दिए घबराई हुई घबराई हुई मुगल सेना अरवले की घाटी  भागने लगीमुगलों को भागते देख सेनापति नेत्र का जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि बादशाह सलामत अकबर विशाल सी लेकर खुद युद्ध भूमि में आ रहे हैं

यह शब्द सुनकर भारतीय मुगल सी सोच में डूब गई की भेज तो अकबर मार देगा नहीं भेज तो राणा मार डालेगा महाराणा प्रताप अब मानसिंह को युद्ध भूमि में ढूंढने निकल पड़े जिसने कहा था कि अगली मुलाकात युद्ध भूमि में ही होगी तभी हुकुम ने देखा कि मान सिंह हाथी पर बैठा था महाराणा प्रताप ने बड़े विवेक से चेतन के अगले पैरों को मानसिंह के हाथी के मस्तक पर टिका दिया और अपने भले से मानसिंह पर करारा प्रहार कियापरमार सिंह अपने हाथी पर लगे हौज में छुपा कर बैठ गया

पर राणा श्री के करारे वार से उसका महावत मर गया मानसिंह के हाथी की सूंड में एक तलवार लटकी हुई थी जिसे चेतन का अगला पैर कट गया इस समय तक महाराणा प्रताप के पैर में एक गोली लगी हुई थी उनके शरीर पर आसन के घाव थे पूरा शरीर खून से लटपट हो चुका था तभी सादड़ी रियासत के झलक बिताने कहा कि हुकुम आपका प्रिय चेतन को इलाज की जरूरत है और आपके पैर पर भी गोली लगी है जिससे जहर फैल सकता है आपको तुरंत वैद्य जी के पास जाएंमहाराणा प्रताप अपने घोड़े चेतक को अपने पुत्र की तरह प्यार करते थे

उन्होंने मेवाड़ का राज क्षेत्र दिया और बॉल सी को पूरा नेतृत्व देना और स्वयं चेतक पर सवार होकर युद्ध को पूरी तरह से पहाड़ियों की तरफ मोड़ लिया जहां पहाड़ियों पर भीलों ने युद्ध का मोर्चा संभाल लिया मुगलों को अब एक नई टक्कर मिली महाराणा प्रताप चेतक को लेकर पर्वतों की ओर निकल पड़े यह चेतन ने 26 फीट की गहरी खाई को कूद कर पर कर लिया और बालिका गांव में कल चेतन नीचे गिरकर बेहोश हो गया तभी महाराणा प्रताप का छोटा भाई शक्ति सिंह जो मुगल सेवा की तरफ से लड़ रहा था

हल्दी घाटी का युद्ध

महाराणा प्रताप का पीछा करते हुए यहां तक आ पहुंचा महाराणा प्रताप बेहोश चेतन को सहला रहे थे कि तभी उनकी नजर शक्ति सिंह पर पड़ी उन्होंने शक्ति सिंह से कहा सीना खुल्या मार भाला तुम गोद गुलामी टिकन लगे भारत माँ ते कहे दुगा।  तेरे पुत्र बामड़ में बिकने दामड लगे हल्दीघाटी के मैदाने में घमासान युद्ध चल रहा था घाटी के दरों में राणा पूजा भील और राजपूत सरदार मुगलों को भीषण टक्कर दे रहे

अंत में मानसिंह ने हल्दीघाटी के दर्दों में जाने की बजाय मुगल सी को वापस अजमेर चलने का आदेश दिया अकबर की विशाल साधन संपन्न सेवा का गरबा मेवाड़ी सी ने मिट्टी में मिला दिया मान सिंह और आजम खान जब खाली हाथ अकबर के सामने उपस्थित हुए तो क्रोधित अकबर ने तीन महीने तक उनके दरबार में आने पर पाप बिंदी लगा दी उनके संपत्ति को जप्त कर लिया गया

उनका वेतन और सभी सुविधाओं को तुरंत रोक दिया गयाहल्दीघाटी के भयानक युद्ध के बाद महाराणा प्रताप अपनी सेवा के साथ कुंभलगढ़ आ गए विनाशकारी युद्ध का पाषाण महाराणा प्रताप के पक्ष में था पर इस समय तक उनका खजाना खाली हो चुका था

Maharana Pratap : महाराणा प्रताप का इतिहास Deadly योद्धा 208

हल्दीघाटी के चार महीने बाद ही कर 1577 में अकबर ने एक बार फिर शाहाबाद खान के नेतृत्व में भारी खान के नेतृत्व में भारी सी कुंभलगढ़ पर हमला करने के लिए भेजी हल्दीघाटी जैसे विशाल युद्ध के बाद एक नया युद्ध मेवाड़ की सेवा के लिए भारी था अतः महाराणा प्रताप ने किले को त्याग दिया कुंभलगढ़ पर शाहबाज खान का अधिकार हो गया.

कुछ महीनो के बाद महाराणा प्रताप ने फिर से सीधा तैयार की और पूरी तैयारी के साथ शाहबाज शाह पर आक्रमण करके कुंभलगढ़ को वापस जीत लियाऔर महाराणा प्रताप ने आगे की रणनीति बनाने के लिए सभी सरदारों को बुलवायाजहां सरदारों ने हुकुम से कहा कि हमें सिंह की तरफ निकालना चाहिए जहां हम धन का बंदोबस्त करके एक विशाल सेवा का निर्माण करेंगे और सीधा अकबर पर आक्रमण करेंगे इसी उद्देश्य से महाराणा प्रताप भाषण कर को कुंभलगढ़ का किलेदार नियुक्त करके गुजरात की तरफ निकल गए.

आगे इसी रास्ते में Maharana Pratap ने शाहबाज खान को दो बार पराजित करके वापस लौटने पर मजबूर किया गुजरात पहुंचने के बाद Maharana Pratap ने चलिया गांव में अपना डेरा लगाए जहां पर दानवीर भामाशाह ने Maharana Pratap के लिए अपना खजाना खोल दिया उन्होंने उन्होंने Maharana Pratap को 25 लख रुपए की सहायता दी इतने बड़े धन को पकड़ हुकूम सेवा की तैयारी में जुट गए बस यही से असली संघर्ष की शुरुआत होती है

1582 रूद्र रूप

 Maharana Pratap ने सिंध जाने की बजाय पुणे मेवाड़ की तरफ कुंज किया 1582 में दिवेर के दरों में स्थित मुगल स्थान पर आदि के समान टूट पड़े हुकुम रूद्र रूप धारण कर चुके थे उन्होंने अपने सामंतों को आदेश दिया के किले को चारों तरफ से घर को कोई बचकर नहीं निकलना चाहिए तभी Maharana Pratap के पुत्र अमर सिंह ने अकबर के चाचा सुल्तान खान पर भाला फेंक जो सुल्तान खान के घोड़े सहित आर-पर निकल गया यहां 36000 मुगलों ने Maharana Pratap के सामने आत्मसमर्पण कर दिया महाराणा ने दिवेर के किले पर केसरिया ध्वज लहरा दिया

और अकबरने सन 1984 में Maharana Pratap को बंदी बनाने के लिए भेजा के लिए भेजा पर जगन्नाथ कछवाहा बुरी तरह से पराजित हुआ उसने Maharana Pratap से माफी मांगी और बाकायदा हर जाना भी दिया इसी के बाद Maharana Pratap ने कमाल मर के किले को जीत लिया जहां अमर सिंह ने कमाल मर के मुगल अधिकारी अब्दुल्ला को कई टुकड़ों में काट डाला इन्हीं लगातार जीतो के बाद 1585 में Maharana Pratap ने चावंड को जीत कर उसे अपने राजधानी बनाया

इसके बाद उन्होंने लगातार एक-एक करके मुगलों के 32 किलो को जीत कर अकबर की नींद हराम कर दीमान सिंह से उसके देशद्रोह का बदला लेने के लिए Maharana Pratap ने अपनी सेवा लेकर आमिर के मालपुरा पर आक्रमण किया जहां से उन्होंने मानसिंह की बेशुमार दौलत को अपने कब्जे में लिया अकबर ने स्वीकार कर लिया था कि राजपूताने के इस शहर को कोई कैद नहीं कर सकता उसने अब Maharana Pratap को न छोड़ने में ही अपने भलाई समझी इसके बाद 12 सालों तक Maharana Pratap ने ऐसा शासन किया

मेवाड़ Maharana Partap

कि मेवाड़ के व्यापार को चार चांद लग गए मेवाड़ की खोई हुई चमक वापस लौटने लगीजनवरी 1597 को 57 वर्ष की आयु में हुकुम शेर के शिकार पर निकले थे जहां धनुष की प्रत्यंचा खींचते हुए हुकूमत देवलोक सिद्धार्थ गए वीर शिरोमणि Maharana की देशभक्ति और अमर स्वाभिमान ने हर भारतीय के मन में उनके लिए आभार सम्मान जागृत किया कवियों ने भी अपनी कलम से महाराणा की कीर्ति का कुछ नया महान किया धर्म रहेगा

और पृथ्वी भी रहेगी पर मुगल साम्राज्य एक दिन नष्ट हो जाएगा और जहां है राणा विशंभर भगवान के भरोसे अपने निश्चय को अटल रखनाअब्दुल रहीम खान एक खाना जिसने अपने घोड़े को कभी शाही सेवा में भेज कर दाग नहीं लगवाया जिसने अपनी पगड़ी किसी के सामने नहीं झुकी उसके शासनकाल में जनता को किसी से कोई भी नहीं रहा उसकी तलवार और भला ही उसका सच्चा साथी था वह वैदिक मार्ग का अनुवाद था

जलालउद्दीन मुहम्मद अकबर परिचय 

पूरा नामजलालउद्दीन मुहम्मद अकबर
जन्म15 अक्टूबर सन 1542 (लगभग)
जन्म भूमिअमरकोट, सिन्ध (पाकिस्तान)
मृत्यु तिथि27 अक्टूबर, सन 1605 (उम्र 63 वर्ष)
मृत्यु स्थानफ़तेहपुर सीकरी, आगरा
पिता/माताहुमायूँ, मरियम मक़ानी
पति/पत्नीमरीयम-उज़्-ज़मानी (हरका बाई)
संतानजहाँगीर के अलावा 5 पुत्र 7 बेटियाँ
शासन काल27 जनवरी, 1556 – 27 अक्टूबर, 1605 ई.
राज्याभिषेक14 फ़रवरी, 1556 कलानपुर के पास गुरदासपुर
युद्धपानीपत, हल्दीघाटी
राजधानीफ़तेहपुर सीकरी आगरा, दिल्ली
पूर्वाधिकारीहुमायूँ
उत्तराधिकारीजहाँगीर
राजघरानामुग़ल
मक़बरासिकन्दरा, आगरा
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जलालउद्दीन मुहम्मद अकबर मृत्यु 

अकबर, मुघल सम्राट जलालउद्दीन मुहम्मद अकबर, की मृत्यु 27 अक्टूबर 1605 को हुई थी। उनकी मृत्यु का कारण बहुतंत्र महाराजा का एक रोग था जिसे वे बहुतंत्री भय कहते थे। इस रोग के कारण उनकी स्वास्थ्य स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती गई और उनकी कमजोरी बढ़ती गई।

अकबर की अंतिम कुछ दिनों में, उन्होंने अपने आत्मकथा “अकबरनामा” को पूरा करने का निर्णय लिया और अपने आस-पास के सम्राटों के साथ सम्बंध सुधारने का प्रयास किया। अपनी मृत्यु के पूर्व, उन्होंने अपने पुत्र जहाँगीर को अपनी उत्तराधिकारी घोषित किया था।

27 अक्टूबर 1605 को, अकबर का आकस्मिक निधन हुआ, जो उनके राज्य के अंतिम दिनों को चिह्नित करता है। उनकी मृत्यु के बाद, उनका पुत्र जहाँगीर उनकी जगह सम्राट बना। अकबर का निधन मुघल साम्राज्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने सम्राटीय सुप्रधार्म की विविधता में एक सांविदानिक बदलाव की शुरुआत की।

 

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